हम उनके लिये भी कमायें,
ख्ुद ही खाना बनायें ,फिर भी मेंरे घर में वो मातम मनायेे ,
मैकें जायें , मेरे नाम का बिल्ला लटकायें ,
जीजा का बिस्तर गरमायें ,
बुलाने पर न आयें ,
हम अपनी इज्जत को घबराये ,
फिर भी वे आWखे दिखा घरेलू हिसां है ,
हम कोट बुलायें ,
फिर भी न बे आएWं,
न्यायलय को वहलाये - बकील साहव वीमार थे ,
न्यायालय का क्या जाए ,
अगर एक और तारीख मिल जाये,
लेकिनं हम कहां जाएW ,
न्यायालय को कितना गरियाए ,
कि जज साहब सुधर जाएं ,
अपनी इच्छा को कब तक दवाये ,
यह पानी कहॉ बहाये ,
वो मेरे मरने पर बीमा की आस लगाये ,
लम्बी-लम्बी तारीखे लगबाये
फिर भी जबाब न आये ,
इतनी छोटी सी बात ,
न्यायालय समझ में आएं ,
जीजा यह चाहे हम तो “ार्म से ही मर जाए ,
इसकी बीबी और पैसा हमरा हो जाये ,
उन दोनो की करतूत किसी को समझ न आये ।
अभी और कितना स”ाक्तिकरण बांकी है ?
मुस्किल से मिलपाते है हम
अपने बच्चे से चन्द मिनटो के लिये
और तस्वीर पाते हैं उसी दुस्टता की ?
तो अपनी इज्जत ज+नाज उठाने के लिये कहॉ दर्बार लगाये ।
उनको मोहब्बत है मुझसे एक जोंक की तरह ।
वो छोड़ देंगें मुझको एक जोंक की तरह ।
जब उसने कभी समझा ही नही घर ।
मै लाख जतन क्या कर पाता ।
सूखा था वह जंरजर था ,
जिसको मुस्किल से रोका था ।
हवा चली एक झोंका आया ,
बिखर गया सब तिनका-तिनका ।
ख्ुद ही खाना बनायें ,फिर भी मेंरे घर में वो मातम मनायेे ,
मैकें जायें , मेरे नाम का बिल्ला लटकायें ,
जीजा का बिस्तर गरमायें ,
बुलाने पर न आयें ,
हम अपनी इज्जत को घबराये ,
फिर भी वे आWखे दिखा घरेलू हिसां है ,
हम कोट बुलायें ,
फिर भी न बे आएWं,
न्यायलय को वहलाये - बकील साहव वीमार थे ,
न्यायालय का क्या जाए ,
अगर एक और तारीख मिल जाये,
लेकिनं हम कहां जाएW ,
न्यायालय को कितना गरियाए ,
कि जज साहब सुधर जाएं ,
अपनी इच्छा को कब तक दवाये ,
यह पानी कहॉ बहाये ,
वो मेरे मरने पर बीमा की आस लगाये ,
लम्बी-लम्बी तारीखे लगबाये
फिर भी जबाब न आये ,
इतनी छोटी सी बात ,
न्यायालय समझ में आएं ,
जीजा यह चाहे हम तो “ार्म से ही मर जाए ,
इसकी बीबी और पैसा हमरा हो जाये ,
उन दोनो की करतूत किसी को समझ न आये ।
अभी और कितना स”ाक्तिकरण बांकी है ?
मुस्किल से मिलपाते है हम
अपने बच्चे से चन्द मिनटो के लिये
और तस्वीर पाते हैं उसी दुस्टता की ?
तो अपनी इज्जत ज+नाज उठाने के लिये कहॉ दर्बार लगाये ।
उनको मोहब्बत है मुझसे एक जोंक की तरह ।
वो छोड़ देंगें मुझको एक जोंक की तरह ।
जब उसने कभी समझा ही नही घर ।
मै लाख जतन क्या कर पाता ।
सूखा था वह जंरजर था ,
जिसको मुस्किल से रोका था ।
हवा चली एक झोंका आया ,
बिखर गया सब तिनका-तिनका ।
