Sunday, February 28, 2010

नारी की स्वच्छंदता

आज जिस विषय की तरफ आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हॅंू वह है दहेज उत्पीडन अधिनियम-1961,घरेलू हिंसा अधिनियम - 2005 तथा विवाह विच्छेद अधिनियम । और यह समस्या है लगभग उन 25 करोड लोगो की जो शहरीय क्षेत्र में रहते है तथा सरकारी, अर्ध सरकारी या गैर सरकारी संस्थाओ के कर्मचारी है आप सभी जानते है कि दहेज उत्पीडन अधिनियम को पास कराने के लिए तत्कालीन सरकार को संसद के दोनो सदनो की सयुक्त बैठक बुलानी पडी थी । और तत्कालीन सरकार ने उक्त अधिनियम को बल पूर्वक लागू कर दिया । घरेलू हिंसा अधिनियम भी पुरुषो को पूर्णयतः दुष्ट मानते हुये नारी की स्वच्छंदता को वढ़ावा देता है ।

हमको यह ध्यान रखना चाहिये कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति पुरुषेा के एकल विवाह के समर्थक नही थे ;पृष्ठ 34 समान नगरिक संहिता ,सरला माहेश्वरी -1997द्ध । क्यो ? भारत के प्रथम बिधिमंत्री पुरुष और नारी की समान शिक्षा के समर्थक नही थे । क्यो ? मुस्लिम धर्म एक से अधिक विवाह की अनुमति सामाजिक समझौते के आधर पर देता है । क्यो ? जबकि हिन्दू धर्म , नारी को परोकारी बनाये रखने पर विशेष बल देता है तथा कर्म कॉंडो के माध्यम से सदाचारी बनाने का प्रयास करता है । क्यो ? उपरोक्त दोनो अधिनियमो केा बनाते समय, क्या हमने दोनो धर्मो की मूल भावना और दोनो बुद्धजीवियो की पीडाओ को ध्यान में रखा है ? कहीं हम अगें्रजो द्वारा प्रदत एक पक्षीय विधि व्यवस्था बनाने के आदी तो नही हो गये ? क्या वास्तव में पुरुष दुष्ट प्रजाति के होते हैं ? क्या वास्तव में उनमें परिवारवाद की कोई भवना नही होती ? क्या वास्तव में नारी पर अत्याचार करना उनका सौख है ? क्या वास्तव में वे घर में सुख और शांन्ति नही चाहते ?

हिन्दू विवाह अधिनियम तथा मुस्लिम विवाह अधिनियम क्या मानव की शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं की प्रतिपूति और परिवार संस्था को बनाये रखने में सार्थक है ? दोनो ही धर्मो में शारीरिक और मानसिक आवश्यकता एक अत्यन्त ही गोपनीय बिषय रहा है क्या न्यायलय में अधिवक्ता के माघ्यम से इस पर बहस हो सकती है ? और यदि हॉं तो यह अनौतिक व्यापार से भी ज्यादा सर्मनाक है । क्योकि एक औरत जो एक बार कचेहरी में बैठ जाती है घर की शान्ति और सुरक्षा के योग्य नही होती ,परिवार के माहौल को हमेशा कलेश पूर्ण बनाये रखती है। दुर्भाग्य की बात है कि परिवार संस्था को सबसे निम्न कोटि की इकाई समझा गया है इसकी सुनवायी और फैसलें थाने और खुले न्यायलय में होते हैं और कई बर्षो तक चलते हैं और बर्वाद होती हैं अगली नस्ल । अगली नस्ल क्यो आसक्ति रखे मॉं-बाप के प्रति , समाज और परिवार के प्रति , क्यो रखे आसक्ति ऐसे राष्ट्र के प्रति ? जबकि दूसरी ओर उपभोक्ता फोरम जैसी स्वतंत्र इकाई हैं मामले सीधे थाने में नही ले जाये जाते ।

परिबार संस्था आर्थिक और सामाजिक स्थित से प्रभावित होती है । और आज राजनिति भी इस पर प्रभावी होने का प्रयास कर रही है । परिवार मन्दिर न हो कर संसद हो गया है । आज की पतनी अर्धांगिनी न होकर सशक्त बिपक्ष हो गयी है । क्या आप लोग परिवार का यही रूप बनाये रखना चाहते है ? बाहर से थक-हार कर एक व्यक्ति घर आता है सकून के लिये एक भावात्मक सुख , किन्तु मिलता है द्वन्द ,बगावत और बिरोध के न-न प्रकार ,शारीरिक सुख कोसो दूर । और जब दिल टूटता है तो किसी को सुनायी नही देता और किसी न्ययालय से कोई राहत भी नही मिलती और जब मूॅह फूटता है ? यदि तलाक को आसान बना दिया जायें तो दुर्घटना बस बच्चे पैदा नही होगे और कोई घरेलू हिंसा भी नही होगी ।

आज कल नारी सशक्तिकरण की बात चल रही है । इस नारी सशक्तिकरण की दिशा क्या है ? बिना किसी आरक्षण के भारत की राष्ट्रपति एक महिला है कई राज्यो की राज्यपाल और मुख्यमंत्री महिलाये रही हैं । फिर भी नारी शारीरिक रूप से कमजोर है तो प्रकृतिक कारणेा से, प्रकृति द्वारा सौंपी गयी जिम्मेदारियो के कारण , मनिषियो ने परिवार संस्था का गठन कर आर्थिक और सामाजिक रूप से नारी को सशक्त बनाया है पशुओ कि तरह मातात्मक समाज न बना कर पुरुष प्रधान समाज बनाया तथा पुरुष पर भरण पोषण की जिम्मेदारी डाली गयी । जब परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी पुरुष को सौंपी गयी इस लिये नारी की यौन स्वच्छंदता भी सीमित हो गयी । फिर भी नियोग प्रथा और परिवारवाद ने नारी की यौन इच्छा पर पूर्ण प्रतिबन्ध नही लगाया । मनिषियो ने नारी के शारीरिक संरचना को ध्यान में रखते हुए परिवार का गठन किया तो दूसरी तरफ पुरुष की शारीरिक संरचना को ध्यान में रखते हुए तथा परिवार की मरियादा को बनाये रखने के लिये नगरवधू और गणिका जैसी प्रथओ को भी जन्म दिया । यदि आज नारी सशक्तिकरण का मतलब यैान स्वछंदता तथा समलौंगिकता है तो इसका लाभ पुरुषो को भी मिलना चाहिये तथा आई0 टी0 पी0 एक्ट-1956 को शून्य कर दिया जाना चाहिये ।

आज की नारी परायाधन नही होती और न ही उसकी परवरिश पराये धन के रूप में होती है पराये घर में दी गयी उधार की वस्तु मात्र होती है जिसके माध्यम से पराये घर की गोपनीयता और सौहाद्रता में सेंध लगायी जाती है । उपरोक्त दोनो अधिनियमो ने पराये घर की इज्जत केा तार-तार करने के व्यापक अस्त्र प्रदान कर दिये हैं । सामान्यतः एक पुरुष का विवाह तब होता है जब वह चार पैसे कमाने लगता है । और एक नारी का विवाह तब कर दिया जाता है जब वह किसी भी कारणवश अपने मॉ-बाप पर भार होने लगती है । हमारे सम्पूर्ण शिक्षा जगत् विवाहपरान्त व्यवहार की शिक्षा नही दी जाती दो परिवारो की सौहद्रता और गोपनीयता बनाये रखने की शिक्षा नारी को प्राप्त नही है । जबकि स्थान परिबर्तन नारी का होता है इसलिए उसे यह शिक्षा अनिवार्य रुप से दी जानी चाहिए । दो परिवारो के संस्कार समान नही होते इसलिए नारी का स्वयं का व्यवहार ,और मैके पक्ष द्वारा दिया गया परामर्श सार्थक नही होता है परिस्थितियो से तार-तमय् बैठाना उसकी शिक्षा का अंग नही रहा है इसलिए विवाद निश्चित है । स्त्री-पुरुष का परस्पर व्यवहार अन्य संबधो से प्रथक होता है । एक पुरुष अपनी स्त्री को उस प्रकार प्रेम नही कर सकता ,जैसे एक पिता अपनी पुत्री को करता जहॉ पिता में मात्र त्याग है अपेक्षायें कुछ भी नही । दूसरी तरफ स्त्री यह अपेक्षा रखे कि पुरुष उससे पिता तुल्य व्यवहार करेगा और उसे कोई अपेक्षा नही करेगा तो हितो का टकराव निश्चित है जिस स्त्री ने विवाह से पहले सुबाह उठकर अपने भाई या पिता को आफिस जाने के लिये खाना नही दिया है तो वह पति को भी नही दे सकेगी । आदत नही छूटती इतनी आसानी से । सुवाह उठकर खाना देने में तकलीफ होती है तो बार-बार मैंेके भागने का प्रयास करेंगी जो आर्थिक और साममजिक संतुलन बिगाडेगा तो तनाव उत्पन्न होगा तो मैके जाने पर बंदिस भी लगेगी। तब साजन की सेंज अंगारो की सेंज लगेगी , सुवाह की चाय में चीनी कम और दाल में नमक ज्यादा हो जायेगा । और पूरा घर अखडा हो जाता है । तो गुस्से से कोई पूछ बैठेगा ,मैके जाओगी तो कौनसे लाल ले आओगी । बस बहाना मिल गया लम्बे समय तक मैके में रूक जाने का । ससुराल बाले और दहेज मॉग रहे हैं अब न कोई जिम्मेदारी न सुबाह उठने का झंझट । उस औरत को लगता मैने नीचा दिखा दिया जब तक इस औरत को होश आयेगा जिन्दगी बिखर चुकी होगी । इस औरत की नीचताओं की पति तब तक पंचायत नही करेगा जबतक उसे अपने घर का अंग समझता है । क्योकि बेड रूम में उपेक्षा ,असहयोग और सुवाह के नास्ते-खाना पर कोई पति पंचायत करना नही चाहेगा । उस औरत के भाई और बाप-मॉ को उसकी कमिया कभी नजर नही आयेगी । और यदि इस औरत की मॉ स्वयं दुष्ट औरत रही है तो वह अपने पति को नमक मिर्च लगाकर बतायेगी । और दमाद को नीचा दिखाने का षणयंत्र करती है । जब भाई और बाप-मॉ इस औरत कमियां नजर आयेंगी तब यह औरत घर में रखे जाने योग्य नही रह जायेगी । तब इस औरत को पति पर थोपेने के लिए इन अधिनियमो के माध्यम से षणयंत्र किया जाता है ।

अब तो लोग डरने लगे है शादी करने से वीवी रखने से , आज बुद्धजीबी भी समलैंग्गिता पक्ष में बिचार रखते , क्योकि इसमें विवाह अधिनियम ,दहेज उत्पीडन ,घरेलू हिंसा जैसे कानूनो का खतरा नही है । बीबी रोज भागती है मैके , सुवाह नही देती टाइम से खाना, न्यायालय गये तो पूरी जिन्दगी गुजर जायेगी खडे-खडे और हाथ लगेगी बेजती, कुछ कह दिया तो हो जायेगी घरेलू हिंसा और बजंा देगा कोई तुम्हारे घर की घंटी और लगायेगा नम्वर और मॉंगेगा दूध। इसलिए एक नैाकर रख लेा सारे काम आयेगा । क्या यही नारी सशक्तिकरण है कि लोग जीवन जीने की कृतिम विधियंा अपनाने को मजब्ूर हैं । स्त्री-पुरुष एक दूसरे कंे पास पहुचॅकर भी सुख की अनुभूति नही कर रहे है यह कैसी स्पर्धा जहॉ कृतिम सुख वास्तविक सुख से अधिक सुखद है । क्योकि इसमें विवाह अधिनियम ,दहेज उत्पीडन ,घरेलू हिंसा ,उत्तरदायित्व , संपत्ति के उत्तराधिकार जैसे कानूनो का झंझट नही है ।

मैं आपका ध्यान आकर्शित करना चाहूॅंगा अच्छी शिक्षानीति वह है जो जीवन को सरल और व्यावहारिक बनाये । डा0 भीम राव अम्बेडकर ने नारी और पुरुष की शिक्षा में विभेद किया है वे समान शिक्षा के पक्षधर नही थे । क्योकि प्रकृति द्वारा सौपें गये दायित्व अलग-अलग हैं । स्पष्ट कर दूॅ मै व्यवसायिकि और रोजगार परक शिक्षा की बात नही कर रहा हूॅ । दुर्भाग्य की बात यह है कि स्त्री-पुरुष के परस्पर व्यवहार की शिक्षा दोनो को ही नही दी जाती । प्रकृति स्त्री-पुरुष को शारीरिक संबधो के लिए तैयार करता है विवाह संबध के लिये नही ,विवाह संबध एक सामाजिक संबध है । कानून ने इस पर जटिलताओ को थोपा है । इसलिए राष्ट् और सामाज को स्त्री और पुरुष को विवाह संबधी व्यवहार की शिक्षा देनी ही पडेगी । कुछ लोगो को आश्चर्य हो सकता है किन्तु यह आज की आवश्यकता है । जब कोई स्त्री-पुरुष प्रकृति संबध अपना लेते है तो आप के समाज में है तोबा मच जाता है । और आप लोग उन्हे विवाह बंधन में बधने पर मजबूर कर देते हो । किन्तु इस बंधन की शिक्षा उनके पास भी नही है । दूसरी तरफ आप का समाज उनके दोस्त ,हमदर्द और रिस्तेदार बनकर उनके जीवन में जहर घोलने का प्रयास करता है । तब आप द्वारा निर्मित यह हथियार ;अधिनियम द्धउनके काम आते है ।

क्या वास्तव में विवाहपरान्त व्यवहार की शिक्षा दिये जाने की आवश्यकता है ? एक समय था जब सयुक्त परिवार में पैतृक व्यवसाय का चलन था पिता से पुत्र को आसानी से सारी विरासत ; व्यवसायए धन और ज्ञान द्ध प्राप्त हो जाती थी ,किन्तु जैसे -जैसे परिवर्तित व्यवसायो का चलन बढा , ट्र्ेनिग स्कूलो का प्रचलन भी बढा , नयी तकनीक ने भी ट्र्ेनिग स्कूलो के महत्व को बढाया है । काफी लम्बे समय से परिवारो का विघटन बढा है सयुक्त परिवार एकल परिवारो में विखंडित हो रहे हैं । परम्परागत ट्र्ेनिग स्कूलो ;संयुक्त परिवारद्ध से विवाहपरान्त व्यवहार की शिक्षा स्वतः प्राप्त हो जाती थी , जो अब नही है । सास-ससुर को नही पता कि दमाद-लडकी या लडके-बहू से किस प्रकार व्यवहार करना है किन मामलो में दखलनदाजी करनी है और किस स्तर तक और किन मामलों पर मैान रहना है । सामान्यतः सास-ससुर ही दमाद-लडकी या लडके-बहू के सबन्धो में खटास पैदा करते हैं जिसका उन्हे स्वयं बोध नही है । सीमित परिवारो के चलन ने भी सयुक्त परिवार को खत्मकर दिया है । अब वह परमपरागत ज्ञान समाप्त हो चुका है । शहरो की भागती दौडती जिन्दगी ने हर पीढी के व्यक्ति को जीवन जीने के पृथक आयाम दिये हैं । पिता का जीवन जीने का व्यवसाय अलग था व्यवसायिक स्थल से प्राप्त तनाव अलग तरह का था इसलिए परिवार की एक अलग तरह की व्यवहारिक संस्कृति विकसित होगी । जबकि पुत्र ,पुत्री ,बहू और दमाद का व्यवसाय सामान्यतः अलग किस्म का होता है । इसलिए पिता द्वारा दी गयी शिक्षा सार्थक नही होगी । हम शिक्षा उससे लेना पसन्द करते है जिसका प्रेम हमें दिखयी देता हो या जो उस शिक्षा का विशेषज्ञ हो । शहरो की व्यवसायिक संस्कृति ने परिवारो को यह महोल दिया ही नही है कि हम प्रेम के छड एक दूसरे के साथ बिता सकें समस्त रिस्ते व्यवसयिक हो चुके हैं । जब तक सत्य का बोध होता है जिन्दगी विखर चुकी होती है । इसलिए आवश्यक है कि विवाहपरान्त व्यवहार की शिक्षा दी जाये । तकि जीवन सरल हो , किसी पति के लिये यह संभव नही है कि वह हररोज आकर बताये कार्यालय का तनाव बल्कि वह घर से घर की अपेक्षा करेगा जिसमें तनाव दूर हो सकें । यदि पतनी द्वारा ऐसा महोल नही दिया जाता तो वह अन्य विकल्प तलास कर लेगा । वह नैतिक हो अनैतिक ,उन्हे प्राप्त करने के साधन चाहे आचार पूर्ण हो या भृष्टाचार पूर्ण । भूमंडलीयकरण के इस युग में सब कुछ व्यवसायिक हो चुका है पति-पतनी संबध भी इससे अछूता नही रहा है । प्रति दिन पति उपहार लाये तो ठीक अन्यथा ? वेतन की सीमित पूॅजी में प्रति दिन उपहार नही आ सकता और यदि कैरियर संबधी शिक्षा अधूरी है तो बिल्कूल ही प्रतिदिन उपहार नही आ सकता । सरकारी सुपरवाइजर से लेकर चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी तक कोई भी इमनदारी की नौकरी करके घर मे नौकर रखने की स्थति में नही होता है सुबाह के नास्ते से लेकर रात्रि को थकान दूर करने तक पत्नी पर आश्रित होता है । पतनी द्वारा सेवा में उपेक्षा और तिरस्कार घर में कामवाली रखने पर मजबूर करता है तकि सुबाह का नास्ता बिना किसी अबरोध के प्रेम से मिल सके । और जब घर में कामवाली आती है तो पडोसी के घर की अर्थिक उन्नति की सूचनाये भी लाती है । और सुरु हो जाता है तृष्णो का दौर जोकि अत्याधिक धन प्राप्त करने के लिए भ्रटाचार को प्रेरित करता है और एक बार भ्रष्ट हो गये तो यह लत भी नही छूटती क्योकि यदि तृष्णो की पूर्ति नही की तो बिस्तर भी सूल लगेगा । दूसरी तरफ वह कामवाली औरत जो अपने बच्चे को बिना नास्ता कराये चली आयी है , का बच्चा मॉ शव्द से परिचित नही हो पाता उसकी नजर में सभी औरतें हैं ! क्योकि जिस बच्चे ने मॉ के हाथ से प्रेम से सुबाह का नास्ता पाया है उसके मुॅह से किसी के लिये कभी भी मॉ की गाली नही निकलेगी । कुछ घमड़ी महत्वकांक्षी औरतो ने समाज और राष्ट््र के प्रेम पूर्ण ढ़चे को ही नस्ट कर डाला है किन्तु यह उनका दोष नही है यह नीतिकारो की नौतिक शिक्षा का दोष है स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक है जबकि नीतिकार स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे के समान होने की शिक्षा देते हैे । स्त्री के कार्यो की तुलना पुरुष से करके प्रतियोगिताये करायी जाती है । एक स्त्री के हवाई जहाज चलालेने से न तो समाज को और न ही राष्ट्र् को बहुत बडी उपलब्धि हासिल होने वाली है । बल्कि उस बच्चे का जिसकी मॉ होने का यह ढोगं करेगी बह बच्चा कुपोषित होगा जो अपने पति या पतनी को तथा बच्चे को कभी भी प्रेम नही कर पायेगा । सभी सामाजिक रिस्ते उसके लिए भवना हीन होगें । आवश्यकता है कि हम पुनः अपनी शिक्षा नीति का मूल्यॅाकन करें ।

कार्य स्थल से प्राप्त तनाव के साथ जब एक कार्मिक घर लौटता है । तो वह कोई अन्य तनाव झेलने की स्थिति में नही होता है । आठ दस घन्टे रंग मंच पर रहने के वाद वह बुद्धिमता से नही वल्कि दिल से काम करता है परिवार में प्रेम पूर्ण महोल हो तो प्रेम पूर्ण व्यवहार करेगा और यदि नफरत पूर्ण माहोल है तो नफरत पूर्ण व्यवहार करता है जोकि एक मानवीय प्रक्रिया है । पर यह प्रेम कैसे उत्पन्न होता है यह एकल परिवार को कौन बतायेगा ?

उच्च न्यायलय और सर्वोच्य न्यायलय द्वारा परिवारो के विखंडन पर चिन्ता जहिर की जाती रही है , परिवारिक वाद सिविल मामलो के अर्न्तगत आते है कई वर्षो तक न्यायलय में चलते है । शारीरिक आवश्यकता पर मनोचिकित्सक और चिकित्सको की क्या राय है ? अतृप्त व्यक्ति की तृप्ति के क्या साधन है । आपको ज्ञात होगा पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर के अपनी शिष्या से संबध होने पर कैमरे के सामने उनकी वीवी ने उनकी बनियान फाड डाली तथा उनकी शिष्या को रोड पर घसीट कर पीटा समाचार चैनल इसको व्राडकास्ट करते रहे , एक प्रोफेशर की वीवी ने कैमरे के सामने उनकी बनियान फाड डाली , बेडरुम के अन्दर इस औरत की दुष्टता क्या होगी ? यह हरकत एक पुरुष ने की होती तो वह महिला उत्पीडन मे आ जाता किन्तु इस औरत पर मुकदमा किस कानून के अन्तगत दर्ज होगा ? वह प्रोफेसर मानसिक सुख से अतृप्त था या शारीरिक सुख से या दोनो से । पतनी से दोनो ही तरह के सुख की अपेक्ष की जाती है एक सुख के विना दूसरा सुख अधूरा है । विकल्प क्या है ? न कोई शिक्षा संस्थान जो इस घुटन से बाहर निकलने का मार्ग बताये । और न ही न्यायलय ऐसी दुष्ट औरत से शीघ्र मुक्ति देगा । मा़त्र विकल्प तीन हैं अबैध संबध , व्यभचार , या घरेलू हिंसा ! अगर तीनेा रास्ते बन्द है तो प्रतिक्रिया निम्नवत होगी:-अधिनष्त महिला कर्मारियो का यौन शोषण ,समलैंग्गिता नाबालिको के साथ कामुकता पूर्ण व्यवहार , प्रगति पाने के इच्छुक अधिकारियोे और कर्मचारियो से यैान अपेक्षा या उसको प्राप्त करने के संसाधन अपेक्षा करेगा । जो जितना शक्तिशाली है उसी के अनुरुप व्यवहार करेगा । यौन कुन्ठा कार्य और कार्यस्थल पर विपरीत प्रभाव डालेगी । चिडचिडापन , झुल्झुलाहट , सर दर्द कार्य करने म्ेां अनिक्षा पैदा करेगा । उच्च पदेन अधिकारी न्यायलय में होने वाली बेजती से बचना चाहते है क्योकि वकीलो के बेतुके सबालो से किसी भी इनसान का खून खौल सकता है न्यायलय की गरिमा की छति के साथ उसे अपनी नौकरी से भी हाथ धेाना पड सकता है इसलिए बेचारा धर में वेजती सहता रहता है और इस कुिन्ठत होता है ।

दुख की बात है कि इन गोपनीय विषय पर बात के लिये कोई निष्पक्ष ,सशक्त ,गापनीय, सामाजिक संस्था या कानूनी संस्था नही है जो ततकाल उपचार कर सके , या विवाह विच्छेद पर ततकाल अन्तिम निर्णय सकें । विधि वेताओ और विधि विशेषज्ञो कि यह अवधरण गलत है कि पति-पतनी के निर्णय लंबित रखने से घर सुरक्षित रहेगें । एकल परिवार में जहॉं हर शाम अकेलापन महसूस होता है इस अकेलेपन को शेर करने बाला कोई न हो तो मोहब्बत नही जागती बल्कि नफरत जागती है जो नया साथी तलाश करने को मजबूर करती है । विपरीत परिस्थति में खेजे गये साथी का साथ जीबन भर नही छूटता ऐसे में विधि वेताओ और विधि विशेषज्ञो अवधारणा निर्मूल साबित होगी । और जो औरत एक बार कचेहरी में बैठ जाये वह औरत परिवार की सुख और सुरक्षा दोनो के लिए ही सदैव घातक रहेगी उसके संबध अपने पुराने यारो के साथ उसी तरह बरकरार रहेगें जो कि परिवार की गापनीता के लिए घातक है ऐसी औरत के रहते घर में न तो सुख रह सकता है न शान्ति । पुरुष को घुट-घुट कर जीने पर क्यो मजबूर किया जा रहा है । न्यायलय में परिवरिक विवादो को लंबित रखकर मानवीय जीवन को कष्टमय् बनाया जा रहा है । जो समाज में अन्य तरह के अनाचार ,दुराचार , भ्रष्टाचार को पैदा करेंगें या बढावा देगें । क्योकि शारीरिक भूख और सनिध्यता का सुख की पूति तो करनी ही है ।

यदि हिन्दुस्तान में इमानदार ,निष्ठावान न्यायधीशो का अभाव है तो इस भूमंडलीकरण के युग में विदेशो से आयात कर लिया जाना चाहिये । क्योकि एक आम आदमी शासन से न्याय प्रिय शासन की अपेक्षा करता है । और अगर न्याय ही लबिंत रहे तो यह शासन द्वारा किया गया सबसे बडा अन्याय है ।

संपन्न वर्ग के परिवारो में महिलाएॅ अधिक सशक्त हैं इसलिए घर का तनाव कार्य स्थल पर अधिनिस्तो को झेलना पडता है जबकि अधिनिस्तो को प्रदत तनाव का दुस्परिणम घर पर दिखाई पडता है । और कलेश का कारण बनता है । यदि अधिनिस्तो के घर सशक्त होने पर द्वन्द होता है कार्य स्थल पर आम जनता के कार्य में शिथिलता तथा शेाषण बढ जाता है । तृष्त आम जनता उच्च अधिकारियो के कार्य केा बढा देता है । उच्च अधिकारियो प्रबंधन की समस्या को लेकर फिर तनाव ग्रस्त होते है ।

तनाव चक्र को ध्यान में रखते हुये आवश्यक है कि स्त्री-पुरुष के संबधो केा अन्य संबधो से पृथक रखकर पुनः मुल्यांकन किया जाये प्राकृतिक जिम्मेदारियो ध्यान मे रखते हुये पृथक-पृथक शिक्षा दी जानी चाहिये । ऐसी सशक्त संस्थाओ का भी सृजन किया जाना चाहिये जो विवाहपरान्त व्यवहार की शिक्षा दे सकें । तथा अनमेल जोडो को शाीघ्रता से पृथक कर सकें तकि दुर्घटनावस बच्चे पैदा न हो । ऐसे कानून को शून्य कर दिया जाना चाहिए जो परिवार मंें वाहय हस्तक्ष्ेाप को बढावा देते हों । पुरुषो को भी सम्मान की जिन्दगी जीने का अवसर प्रदान किया जाये ।

वर्ना पुरुषो की अगली पीढी यही कहेगी ‘‘ कोरा नही पर क्वॅारा हूॅं । ’’

सभी ओशो दर्शन पर चलने को अग्रसर होगें ।

शासन को ब्रद्धा आश्रम की तरह बाल आश्रमो की संख्या बढानी पडेगी ।

अन्यथा राट्र् की मानव शक्ति समाप्त हो जायेगी ।

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